0 भारत में सामाजिक परिवर्तन एवं विकास – Soft Study Akash Kumar

भारत में सामाजिक परिवर्तन एवं विकास

भारत में सामाजिक परिवर्तन एवं विकास

मने पिछले अध्याय में यह जाना कि किस प्रकार उपनिवेशवाद से हुए परिवर्तनों ने भारतीय सामाजिक ह संरचना में बदलाव उत्पन्न किए। औद्योगीकरण और नगरीकरण ने जनजीवन में रूपांतरण किया। कुछ लोगों ने खेत के स्थान पर कारखानों में काम करना प्रारंभ किया। बहुत से लोग गाँवों को छोड़ शहरों में रहने लगे। या कि रहने और कार्य करने की प्रणालियाँ अर्थात् संरचनाओं में परिवर्तन हुआ। संस्कृति, जीवनशैली, प्ररूप, मूल्य, फैशन और यहाँ तक कि भाव-भाँगमाओं में भी गुणात्मक बदलाव हुए। समाजशास्त्रियों की समझ में सामाजिक संरचना का अर्थ “लोगों के संबंधों की वह सतत व्यवस्था है जिसे कि सामाजिक रूप से स्थापित प्ररूप अथवा व्यवहार के प्रतिमान के रूप में सामाजिक संस्थाओं और संस्कृति के द्वारा परिभाषित और नियंत्रित किया जाता है। ” आपने पहले ही अध्याय-1 में उन संरचनात्मक परिवर्तनों का अध्ययन कर लिया है जिन्हें उपनिवेशवाद ने उत्पन्न किया। इस अध्याय में आप यह जानेंगे कि वे संरचनात्मक परिवर्तन सांस्कृतिक परिवर्तनों को समझने के लिए कितने महत्वपूर्ण हैं।

यहाँ आप दो परस्पर संबंधित घटनाओं के बारे में जानेंगे। ये दोनों उपनिवेशिक शासन के प्रभाव की जटिल उत्पत्ति हैं। पहली घटना का संबंध 19वीं शताब्दी के समाज 1 सुधारकों एवं प्रारंभिक 20वीं शताब्दी के राष्ट्रवादी नेताओं के सुनियोजित एवं सजग प्रयासों से संबंधित है। यह उन सामाजिक व्यवहारों में परिवर्तन लाने के लिए था जो महिलाओं एवं निम्न जातियों के साथ भेदभाव करते थे। दूसरी घटना उन कम सुनिश्चित परंतु निर्णायक परिवर्तनों से जुड़ी हुई है जो सांस्कृतिक व्यवहारों में हुए और जिन्हें संस्कृतीकरण, आधुनिकीकरण, लौकिकीकरण एवं पश्चिमीकरण की चार प्रक्रियाओं के रूप में समझा जा सकता है। ये बात बड़ी दिलचस्प है कि संस्कृतीकरण की प्रक्रिया उपनिवेशवाद की शुरुआत से पहले से होती रही जबकि बाद की तीन प्रक्रियाएँ वास्तव में भारत के लोगों की वह जटिल प्रतिक्रिया हैं जो उपनिवेशवाद से हुए परिवर्तनों के कारण हुई।

2.1 उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में

समाज सुधार आंदोलन

हुए

आप जान चुके हैं कि उपनिवेशवाद ने हमारे

जीवन पर दूरगामी प्रभाव डाले। उन्नीसवीं सदी में हुए समाज सुधार आंदोलन उन चुनौतियों के जवाब थे जिन्हें औपनिवेशिक भारत महसूस कर रहा था। आप संभवतः उन सभी सामाजिक पहुलओं से अवगत हों जिन्हें भारतीय समाज में सामाजिक कुरीति माना जाता था। उन सामाजिक कुरीतियों से भारतीय समाज बुरी तरह से ग्रस्त था। सती प्रथा, बाल-विवाह, विधवा पुनर्विवाह निषेध और जाति भेद कुछ इस प्रकार की कुरीतियाँ थीं। ऐसा नहीं है कि उपनिवेशवाद से पूर्व भारत में इन सामाजिक भेदभावों के विरुद्ध संघर्ष न हुए हों। ये बौद्ध धर्म के केंद्र में थे। ऐसे कुछ प्रयत्न, मुख्यतः भक्ति एवं सूफी आंदोलनों के केंद्र में भी थे। उन्नीसवीं सदी में हुए समाज सुधारक आधुनिक संदर्भ एवं मिश्रित विचारों से संबद्ध थे। यह प्रयास पश्चिमी उदारवाद के आधुनिक विचार एवं प्राचीन साहित्य के प्रतीक नयी दृष्टि के मिले-जुले रूप में उत्पन्न हुए। न राय

पंडिता रमाबाई सर सैयद अहमद खाँ

मिश्रित विचार

→ राममोहन राय ने सती प्रथा का विरोध करते हुए न केवल मानवीय व प्राकृतिक अधिकारों से संबंधित आधुनिक सिद्धांतों का हवाला ही नहीं दिया बल्कि उन्होंने हिंदू शास्त्रों का भी संदर्भ दिया।

● रानाई ने विधवा विवाह के समर्थन में शास्त्रों का संदर्भ देते हुए ‘द टेक्स्ट ऑफ द हिंदू लॉ’ जिसमें उन्होंने विधवाओं

के पुनर्विवाह को नियम के अनुसार बताया। इस संदर्भ में उन्होंने वेदों के उन पक्षों का उल्लेख किया जो विधवा पुनर्विवाह को स्वीकृति प्रदान करते हैं और उसे शास्त्र सम्मत मानते हैं। ● शिक्षा की नयी प्रणाली में आधुनिक और उदारवादी प्रवृत्ति थी। यूरोप में हुए पुनर्जागरण, धर्म सुधारक आंदोलन और

प्रबोधन आंदोलन से उत्पन्न साहित्य को सामाजिक विज्ञान और भाषा साहित्य में सम्मिलित किया गया। इस नए प्रकार

के ज्ञान में मानवतावादी, पंथनिरपेक्ष और उदारवादी प्रवृत्तियाँ थीं। सर सैयद अहमद खान ने इस्लाम की विवेचना की और उसमें स्वतंत्र अन्वेषण की वैधता (इजतिहाद) का उल्लेख

किया। उन्होंने कुरान में लिखी गई बातों और आधुनिक विज्ञान द्वारा स्थापित प्रकृति के नियमों में समानता जाहिर की। ● कंकरी विरेशलिंगम की पुस्तक ‘द सोर्स ऑफ़ नॉलेज’ में नव्य-न्याय के तकों को देखा जा सकता है। उन्होंने जुलियस हक्सले द्वारा लिखे ग्रंथों को भी अनुवादित किया।

समाजशास्त्री सतीश सबरवाल ने औपनिवेशिक भारत में की रूपरेखा से जुड़े

निम्नलिखित तीन पहलुओं की विवेचना की है

● संचार माध्यम

● विचारों की प्रकृति नयी प्रौद्योगिकी ने संचार के विभिन्न स्वरूपों को गति प्रदान की। प्रिंटिंग प्रेस, टेलीग्राफ़ तथा बाद में

• संगठनों के स्वरूप, तथा

माइक्रोफ़ोन, लोगों के आवागमन एवं पानी के जहाज तथा रेल के आने से यह संभव हुआ। साथ ही रेल

से वस्तुओं के आवागमन में नवीन विचारों को तीव्र गति प्रदान करने में सहायता प्रदान की। इससे नए विचारों

नयी प्रौद्योगिकी तथा संगठन जिन्होंने संचार के विभिन्न स्वरूपों को गति प्रदान की विकास
भारत में सामाजिक परिवर्तन एवं विकास

The first Ford T in Dehra Dun The first ever bicycle in Dehra Dun was brought dismembered and packed in a box by Alfred Massey Assembied. it caused such a flutter that he decided to bring the first Ford Model T to Massey’s Garage, Ford News, January 11, 1980 retells the story 1914: It was the first car the locals had ever seen… People came by train and bullock cart to see the car. A crowd went to the station to watch the “engine” with rubber tyres being unloaded, it took an hour to fit the wheels and open the hood. The huge packing case was bought by a hawker to serve as a shop. Some 14 men. women, and children climbed on the car and were given their first motor ride up to the family’s garage. Here, Sarah (next to the child) stands with her mother beside the car.

देहरादून में पहली फोर्ड कार

को भी जैसे पंख लग गए। भारत में पंजाब और बंगाल समाज सुधारकों के विचार विनिमय मद्रास और महाराष्ट्र के समाज सुधारकों से होने लगे। बंगाल के केशव चंद्र सेन ने 1864 में मद्रास का दौरा किया। पंडिता रमाबाई ने देश के अनेक क्षेत्रों का दौरा किया। इनमें से कुछ ने तो विदेशों का भी दौरा किया। ईसाई मिशनरी तो सुदूर क्षेत्रों जैसे आज के नागालैंड, मिजोरम और मेघालय में भी गए। B

आधुनिक सामाजिक संगठनों जैसे बंगाल में ब्रह्म समाज और पंजाब में आर्य समाज की स्थापना हुई। 1914 ई. में अंजुमन-ए-ख्वातीन-ए-इस्लाम स्थापना हुई। ये भारत में मुस्लिम महिलाओं की राष्ट्र स्तरीय संस्था थी। समाज सुधारकों ने सभाओं व गोष्ठियों के अलावा जन-संचार के माध्यम जैसे अखबार, पत्रिका आदि के माध्यम से भी सामाजिक विषयों पर वाद-विवाद जारी रखा। समाज सुधारकों द्वारा लिखे हुए विचारों का अनेक भाषाओं में अनुवाद भी हुआ। उदाहरण के लिए विष्णु शास्त्री ने सन् 1868 में इंदु प्रकाश ने विद्यासागर की पुस्तक का मराठी अनुवाद प्रकाशित किया।

स्वतंत्रता एवं उदारवाद के नवीन विचार, परिवार रचना एवं विवाह से संबंधित नए विचार, माँ एवं पुत्री की नवीन भूमिका एवं परपंरा एवं संस्कृति में स्वचेतन गर्व के नवीन विचार आए। शिक्षा के मूल्य अत्यंत महत्वपूर्ण हुए। यह समझा गया कि राष्ट्र का आधुनिक बनना जरूरी है लेकिन प्राचीन विरासत को बचाए रखना भी जरूरी है। महिलाओं की शिक्षा के विषय में भी व्यापक बहस हुई। यह महत्वपूर्ण है कि समाज सुधारक जोतिबा फुले (इन्हें ज्योतिबा भी कहा जाता है) ने पुणे में महिलाओं के लिए पहला विद्यालय खोला। सुधारकों ने एकमत होकर ये माना कि समाज के उत्थान के लिए महिलाओं का शिक्षित होना जरूरी है। उनमें से कुछ का ये भी विश्वास था कि आधुनिकता के उदय से पहले भी भारत में स्त्रियाँ शिक्षित हुआ करती थीं। लेकिन बहुत से विचारकों ने इसका खंडन करते हुए यह माना कि महिला शिक्षा कुछ विशेषाधिकार प्राप्त समूहों को ही प्राप्त थी। इस प्रकार महिलाओं की शिक्षा को न्यायोचित ठहराने के विचारों को आधुनिक व पारंपरिक दोनों ही विचारधाराओं का समर्थन मिला। सुधारकों ने आधुनिकता और परंपरा पर विस्तृत वाद-विवाद भी किए। इस प्रसंग में ये जानना रोचक है कि जोतिबा फुले ने आर्यों के आगमन से पूर्व के काल को अच्छा माना जबकि बाल गंगाधर तिलक ने आर्यों के युग को
जोतिबा फुले

क समाज के उत्थान के लिए महिलाओं को शिक्षित होना जरूरी है। उनमें से कुछ का य विश्वास था कि आधुनिकता के उदय से पहले भी भारत में स्त्रियाँ शिक्षित हुआ करती थीं। लेि बहुत से विचारकों ने इसका खंडन करते हुए यह माना कि महिला शिक्षा कुछ विशेषाधिकार प्र समूहों को ही प्राप्त थी। इस प्रकार महिलाओं की शिक्षा को न्यायोचित ठहराने के विचारों आधुनिक व पारंपरिक दोनों ही विचारधाराओं का समर्थन मिला। सुधारकों ने आधुनिकता परंपरा पर विस्तृत वाद-विवाद भी किए। इस प्रसंग में ये जानना रोचक है कि जोतिबा फुल आर्यों के आगमन से पूर्व के काल को अच्छा माना जबकि बाल गंगाधर तिलक ने आर्यों के युग

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2015-16

सांस्कृतिक परिवर्तन

गरिमामय माना। दूसरे शब्दों में 19वीं सदी में हो रहे सुधारों ने एक ऐसा दौर उत्पन्न किया जिसमें बौद्धिक

तथा सामाजिक उन्नति के प्रश्न और उनकी पुनर्व्याख्या सम्मिलित हैं। विभिन्न प्रकार के समाज सुधारक आंदोलनों में कुछ विषयगत समानताएँ थी। परंतु साथ ही अनेक महत्वपूर्ण असहमतियाँ भी थी। कुछ में उन सामाजिक मुद्दों के प्रति चिंता थी जो उच्च जातियों के ●मध्यवर्गीय महिलाओं और पुरुषों से संबंधित थी जबकि कुछ ने तो ये माना कि सारी समस्याओं का मूल कारण सच्चे हिंदुत्व के सच्चे विचारों का कमजोर होना था। कुछ के लिए तो धर्म में जाति एवं लैंगिक शोषण अंतर्निहित था ये तो हिंदू धर्म से संबंधित समाज सुधारक वाद-विवाद था। इसी तरह मुस्लिम समाज सुधारकों ने बहुविवाह और पर्दा प्रथा पर सक्रिय स्तर पर बहस की। उदाहरण के लिए जहाँआरा शाह नवास ने अखिल भारतीय मुस्लिम महिला सम्मेलन में बहुविवाह की कुप्रथा के विरुद्ध प्रस्ताव प्रस्तुत किया।

उनके अनुसार… जिस प्रकार का बहुविवाह मुस्लिम समुदाय के कुछ हिस्सों में होता है वह वस्तुतः कुरान की मूलभावनाओं के खिलाफ है… ये शिक्षित औरतों की जिम्मेदारी है कि वो अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर अपने रिश्तेदारों को बहुविवाह करने से रोकें।

बहुविवाह के खिलाफ लाए गए प्रस्ताव से उर्दू भाषा के अखबारों, पत्रिकाओं आदि में एक बहस छिड़ गई। पंजाब से निकलने वाली महिलाओं की एक पत्रिका ‘तहसिव ए निसवान’ ने खुलकर बहुविवाह विरोधी इस -ए प्रस्ताव का समर्थन किया, जबकि अन्य पत्रिकाओं ने इसका विरोध किया (चौधरी 1993:111 ) । समुदायों के भीतर इस तरह की बहस उन दिनों आम बात थी। उदाहरण के लिए ब्रह्म समाज ने सती प्रथा का विरोध किया। प्रतिवाद में, बंगाल में हिंदू समाज के रूढ़िवादियों ने धर्म सभा का गठन किया जिसकी तरफ़ से ब्रिटिश सरकार को एक याचिका भेजी गयी। इस याचिका में रूढ़िवादी हिंदुओं ने ये दावा किया कि सुधारकों को कोई अधिकार नहीं है कि वो धर्मग्रंथों की व्याख्या करें एक और दृष्टिकोण भी था जिसके अंतर्गत दलितों ने हिंदू रैली को पूर्वतः अस्वीकृत किया। उदाहरण के लिए फुले के विद्यालय में एक 13 साल की एक छात्रा मुक्ताबाई ने आधुनिक शिक्षा के प्रभाव से 1852 में लिखा:

हर वो मजहब

जो कुछ लोगों को सहूलियत देकर एक जरा भी गुरूर को ए इंसान

बाकी को वंचित कर दे, हर उस मजहब को

ए इंसान

इस धरती से वंचित कर दें. हर उस मजहब के लिए

अपने जेहन में ना रहने दे

क्रियाकलाप 2.1

निम्नलिखित समाज सुधारकों के बारे में सूचनाएँ इकट्ठा करें, जैसेकि किसने किस मुद्दे या समस्या पर काम किया, कैसे संघर्ष किया, किस प्रकार जागरूकता फैलाई, क्या उन्हें किसी प्रकार के विरोध का सामना करना पड़ा?

इंसान ने जेहन में ना रहने दे

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2015-16

2.2 हम संस्कृतीकरण, आधुनिकीकरण, पंथनिरपेक्षीकरण और पश्चिमीकरण को किस प्रकार समझेंगे

भारत में सामाजिक परिवर्तन एवं

इस अध्याय में इन चारों अवधारणाओं संस्कृतीकरण, आधुनिकीकरण, पंथनिरपेक्षीकरण एवं पश्चिमीकरण का विभिन्न वर्गों में अध्ययन किया गया है। जैसे-जैसे हम अपनी विवेचना में आ कि ये चारों अवधारणाएँ कहीं न कहीं एक दूसरे से संबंधित हैं और कई स्थितियों 6/20 पाई जाती हैं। ये कई स्थितियों में अलग-अलग ढंग से सक्रिय होती हैं। यह आश्चर्यजनक नहीं कि एक ही व्यक्ति एक जगह पर आधुनिक होता है तो दूसरी भिन्न स्थिति में वो पारंपरिक भी होता है। इस प्रकार की स्थिति भारतवर्ष में तथा अन्य अनेक गैर-पाश्चात्य देशों

क्रियाकलाप 2.2

समाजशास्त्र में इन का अर्थ पढ़ने के पूर्व यह रुचिकर होगा कि आप कक्षा में निम्नलिखित शब्दों का क्या अर्थ है, पर विचार करें।

– आप किस तरह के व्यवहार को निम्नलिखित

रूप में परिभाषित करेंगे:

पश्चिमी

आधुनिक

धर्मनिरपेक्ष

सांस्कृतिक क्यों?

– – इस अध्याय को पढ़ने के बाद पुनः क्रियाकलाप 2.2 पर आएँ। क्या आप इन शब्दों के सामान्य अर्थ एवं

में स्वाभाविक है।

लेकिन आप जानते हैं कि समाजशास्त्र की विषय-वस्तु प्राकृतिक विश्लेषण पर आधारित नहीं है। (जैसाकि आपने पुस्तक । अध्याय-1 एन.सी.ई.आर.टी. 2006 में पढ़ा है।) पिछले अध्याय में आपने जाना था कि औपनिवेशिक आधुनिकता में आंतरिक विरोधाभास था। उदाहरण के लिए पश्चिमी शिक्षा को लें। उपनिवेशवाद के दौरान अंग्रेजी शिक्षा से एक नए मध्य वर्ग का जन्म हुआ। अंग्रेज़ी भाषा में कुशल नए मध्यवर्गीय भारतीयों ने पश्चिम के अनेक दार्शनिकों के विचारों को पढ़ा-जाना तथा उनके उदार प्रजातंत्र की अवधारणा से अवगत हुए। इन भारतीयों ने भारत को उदारता और प्रगतिशीलता के एक नए रास्ते पर लाने का सपना देखा। लेकिन फिर भी, औपनिवेशिक शासन से भारतीय स्वाभिमान को चोट लगी तो इन मध्यवर्गीय भारतीयों ने पारंपरिक ज्ञान और मेधा पर गर्व जताया। इस प्रवृत्ति को आप 19वीं सदी के सुधार आंदोलनों में भी देख चुके हैं।

समाजशास्त्रीय अर्थ में कोई अंतर पाते हैं? इस अध्याय में आपको स्पष्ट होगा कि आधुनिकता के कारण न केवल नए विचारों को राह मिली बल्कि परंपरा पर भी पुनर्विचार हुआ और उसकी पुनर्विवेचना भी हुई। संस्कृति और परंपरा, दोनों का ही अस्तित्व सजीव है। मानव उन दोनों को ही सीखता है और साथ ही इनमें बदलाव लाता है। हम दैनिक जीवन से उदाहरण लेते हैं। जैसे, आज के भारत में किस प्रकार से साड़ी या जैन सेम या सरोग पहना जाता है। पारंपरिक रूप से साड़ी, जो एक प्रकार का ढीला-बगैर सिला हुआ कपड़ा होता है, को विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग ढंग से पहना जाता है। आधुनिक युग में मध्यवर्गीय महिलाओं में साड़ी पहनने के एक मानक तरीके का प्रचलन हुआ। जिसमें पारंपरिक साड़ी को पश्चिमी पेटीकोट और ब्लाउज के साथ पहना जाने लगा। भारत की संरचनात्मक और सांस्कृतिक विविधता स्वतः प्रमाणित है। यह विविधता उन विभिन्न तरीकों को आकार देती है जिसमें आधुनिकीकरण या पश्चिमीकरण, संस्कृतीकरण या पंथनिरपेक्षीकरण, विभिन्न समूहों के लोगों को अलग प्रभावित करते हैं या प्रभावित नहीं करते। इस पाठ के अगले पृष्ठों में

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