0 प्रितिनिधि लोकतंत्र क्या है ? – Soft Study Akash Kumar

प्रितिनिधि लोकतंत्र क्या है ?

22.1 परिचय

इस इकाई में हम दुनिया में प्रचलित लोकतंत्र के एक रूप, प्रतिनिधि लोकतंत्र के बारे में जान पायेंगे। जैसा कि इसके नाम से पता चलता है कि इस प्रकार के लोकतंत्र में नागरिक अपने प्रतिनिधियों को आवधिक चुनावों के द्वारा चुनते हैं। नागरिकों के यही प्रतिनिधि उनकी अपेक्षाओं को जनमंच, जैसे विधानमण्डलों में जोरदार शब्दों में प्रस्तुत करते हैं। आप प्रतिनिधि लोकतंत्र को निर्वाचक लोकतंत्र (electoral democracy) का पर्यावाची मान सकते।

22.2 प्रतिनिधि लोकतंत्र क्या है?

22.2.1 सीमित और अप्रत्यक्ष

प्रतिनिधि लोकतंत्र, लोकतंत्र का सीमित और अप्रत्यक्ष रूप है इसके सीमित अर्थ में सरकार में भागीदारी बिरले तथा संक्षिप्त होती है और प्रत्येक कुछ सालों में मत देने के अधि वानियम से प्रतिबंधित होती है। इसके अप्रत्यक्ष अर्थ में जनता शक्ति का प्रयोग अपने आप नहीं करती है, लेकिन जनता उनको चुनती है, जो उनके पक्ष में शासन करेंगे। शासन का यह रूप प्रजातांत्रिक इस अर्थ में होता है कि प्रतिनिधित्व सरकार और शासित के बीच विश्वसनीय और प्रभावकारी संबंध स्थापित करता है।

प्रतिनिधि लोकतंत्र की खूबियों के अंतर्गत निम्नलिखित आते हैं :

यह लोकतंत्र के व्यवहारिक रूप को प्रकट करता है क्यूँकि बढ़ी जनसंख्या सरकारी

प्रक्रिया में वास्तविक सहभागीता नहीं हो सकती हैं। यह निर्णय लेने के भार से साधारण नागरिक को मुक्त करता है। इस प्रकार राजनीति में श्रम के विभाजन को संभव बनाता है।

यह राजनीति से साधारण नागरिक को दूर रख कर स्थायित्व बरकरार रखता है।

फलस्वरूप उन्हें समझौतों को स्वीकार करने के लिये प्रोत्साहित करता है।

22.2.2 निर्वाचक लोकतंत्र का पर्यावाची

यद्यपि ये विशेषताएँ प्रतिनिधि लोकतंत्र की आवश्यक पूर्व शर्तें हो सकती हैं, इन्हें ही लोकतंत्र मान होने की गलती नहीं करनी चाहिए। प्रतिनिधि लोकतंत्र में प्रजातांत्रिक गुण, लोकप्रिय सहमति की विचारधारा है, जिसको मतदान के द्वारा अभिव्यक्त किया जाता है।

इस प्रकार प्रतिनिधि लोकतंत्र निर्वाचक लोकतंत्र का एक रूप होता है, जिसके अंतर्गत लोकप्रिय चुनाव को राजनीतिक सत्ता के एकमात्र वैध स्रोत के रूप में देखा जाता है। ऐसे चुनावों को जोकि राजनीतिक समानता के सिद्धांत का सम्मान करना चाहिए सर्वव्यापक वयस्क मताधिकार पर आधारित होता है, बिना जाति, रंग, मत, लिंग, धर्म या आर्थिक स्थिति के भेदभाव के आधार पर चुनावों को नियमित खुला और स्पर्द्धात्मक होना चाहिए। प्रजातांत्रिक प्रक्रिया का सार है, राजनीतिज्ञों की नागिरिकों के प्रति जवाबदेही ।

संक्षेप में, प्रतिनिधि लोकतंत्र का सार इनमें निहित है :

राजनीतिक बहुलवाद राजनीतिक दर्शनों, आन्दोलनों दलों के बीच खुली प्रतियोगिता और तदनुसार ।
22.3 प्रतिनिधि लोकतंत्र के विभिन्न दृष्टिकोण

प्रतिनिधि लोकतंत्र के विभिन्न दृष्टिकोण हैं। सर्वप्रथम, प्रतिनिधि लोकतंत्र में राजनीतिक शक्ति का अंततः दक्षतापूर्वक प्रयोग चुनाव के समय मतों द्वारा किया जाता है। इस प्रकार प्रतिनिधि लोकतंत्र का गुण अंधे विशिष्ट वर्ग के शासन की क्षमता के साथ राजनीतिक सहभागिता के महत्त्वपूर्ण माप में निहित है। सरकार राजनीतिज्ञों के सुपुर्द होती है, लेकिन ये राजनीतिज्ञ लोकप्रिय दबावों के अनुकूल होने को बाध्य होते हैं। साधारण तथ्य है कि जनता प्रथम, उन्हें स्थान पर बैठाती है और बाद में उन्हें हटा देती है। मतदाता राजनीतिक बाजार में उसी प्रकार शक्ति का प्रयोग करता है, जैसा कि उपभोक्ता आर्थिक बाज़ार में करता है। जोसेफ शम्पीटर ने अपनी पुस्तक पूँजीवाद समाजवाद और लोकतंत्र (1976) में. प्रतिनिधि लोकतंत्र का उल्लेख राजनीतिक निर्णय लेने में संस्थागत व्यवस्था के रूप में प्रस्तुत किया, जिसके अंतर्गत व्यक्ति लोगों के मत के लिए प्रतियोगी संघर्ष के आधार पर निर्णय करने की शक्ति प्राप्त करते हैं।

22.3.1 बहुलवादी

दूसरे दृष्टिकोण के अनुसार, लोकतंत्र स्वभाव से बहुलवादी होता है। इसके वृहद अर्थ में, बहुलवाद विविधता या अनेकावस्था के प्रति प्रतिबद्ध होता है। संकुचित अर्थ में, बहुलवाद राजनीतिक शक्ति को बाँटने का सिद्धांत है। यह मानता है कि शक्ति चारों तरफ और समान रूप से समाज में बिखरी होती है और न कि कुछ हाथों में, जैसा कि सभ्रांतवादी (Elitists) दावा करते हैं। इस आधार पर बहुलवाद समान्यतया “राजनीति” समूह के सिद्धांत के रूप में देखा जाता है, जिसके अंतर्गत व्यक्तियों का प्रतिनिधित्व संगठित समूहों, जातीय समूहों के सदस्यों के रूप में किया जाता है और इन समूहों की नीति प्रक्रिया तक पहुँच होती है।

22.3.2 अभिजात्यवादी

यहां एक ऐसे अल्पसंख्यक से तात्पर्य है के पास शक्ति, धन या सुविधा औचित्यपूर्ण या अन्य प्रकार से केन्द्रित होते हैं। अभिजात्यवाद विशिष्ट वर्ग या अल्पसंख्यक के शासन में विश्वास करना है। क्लासिकी अभिजात्यवाद ने जो कि मोस्का पौरेटो और मिशेल द्वारा विकसित हुआ, सामाजिक अस्तित्व के लिए विशिष्ट वर्ग के शासन को अनिवार्य और अपरिवर्त्तनशील तथ्य माना ।

बहुसंख्यक शासन क्या है? कुछ लोग लोकतंत्र को बहुसंख्यक शासन मानते हैं।

बहुसंख्यक शासन एक चलन है जिसकी प्राथमिकता बहुसंख्यक की इच्छा माना है। बहुसंख्यकवाद क्या है? बहुसंख्यकवाद अल्पसंख्यकों और व्यक्तियों के समग्र उदासीनता को दर्शाता है।

22.3.3 प्रतिद्वंदी विचारधाराएँ

प्रतिनिधि लोकतंत्र के अर्थ और महत्त्व के संबंध में अनेक मतभेद हैं। विद्वानों द्वारा उठाये गये कुछ प्रश्न निम्न हैं:

क्या यह राजनीतिक शक्ति के वास्तविक और सक्षम वितरण को सुनिश्चित करता है? क्या प्रजातांत्रिक प्रक्रियायें वास्तविक रूप से दीर्घकालीन लाभों को बढ़ावा देती हैं या स्व- पराजित (self-defeating) होती हैं ?

क्या राजनीतिक समानता आर्थिक समानता के साथ समायोजित हो सकती है?

संक्षेप में, प्रतिनिधि लोकतंत्र की विभिन्न सिद्धांतकारों ने अलग-अलग ढंग से व्याख्या की है। इन व्याख्याओं में सबसे प्रमुख है बहुलवाद, अभिजात्यवाद, नव-दक्षिणपंथ (new-right) और मार्क्सवाद

अनेक राजनीतिक चिन्तकों ने प्रतिनिधि लोकतंत्र को राजनीतिक संगठन के प्रत्येक

अन्य रूप से साधारणतया श्रेष्ठ माना है। कुछ विचारक तर्क देते हैं कि प्रतिनिधि

लोकतंत्र सरकार का एक प्रकार होता है, जो मानवीय अधिकारों की सबसे अच्छी तरह से रक्षा करता है, क्योंकि यह मानवीय आन्तरिक मूल्य और समानता के पहचान पर आधारित है।

कुछ लोग मानते हैं कि लोकतंत्र सरकार का एक प्रकार है जो अधिकतर विवेकपूर्ण निर्णय लेता है, क्योंकि यह सामूहिक ज्ञान और समाज की पूरी जनसंख्या की विशेषता से लाभ उठा सकती है।

दूसरे व्यक्तियों का मत है कि लोकतंत्र स्थिर और टिकाऊ (स्थायी) होता है, क्योंकि उसमें निर्वाचित नेता वैधता की मजबूत कसौटी से बंधे होते हैं। अभी भी कुछ अन्य की मान्यता है कि प्रतिनिधि लोकतंत्र आर्थिक विकास और

सम्पन्नता के लिए सबसे अनुकूल होता है। कुछ ऐसा मानते हैं कि प्रतिनिधि लोकतंत्र में मानव (क्योंकि वे स्वतंत्र होते हैं) अपनी प्राकृतिक क्षमताओं और प्रतिभाओं का विकास करने में सबसे योग्य होते हैं। फिर भी, लोकतंत्र एक कार्य प्रगति में है है- एक विकासशील आकांशा बनिस्पत एक उत्पादित सामग्री के

बोध प्रश्न 1

नोट: i) अपने उत्तर के लिए नीचे दिए गए रिक्त स्थान का प्रयोग करें।

ii) अपने उत्तरों को इकाई के अंत में दिए गए उत्तरों से मिलायें।

1) प्रतिनिधि लोकतंत्र से आप क्या समझते है?

2)

प्रतिनिधि लोकतंत्र के विभिन्न दृष्टिकोणों की चर्चा करें।

22.4 प्रतिनिधि लोकतंत्र के मौलिक सिद्धांत

22.4.1 लोकप्रिय संप्रभुता

इसका अर्थ होता है कि सभी जन सत्ता का अंतिम स्रोत जनता होती है और सरकार वह कार्य करती है जो जनता चाहती है। चार प्रमुख शर्तों को लोकप्रिय संप्रभुता के अंतर्गत देखा जा सकता है:

जनता की चाहत की सरकारी नीतियों में झलक होती है।

लोग राजनीतिक प्रक्रिया में भाग लेते हैं। सूचना उपलब्ध होती है और वाद-विवाद किया जाता है।

बहुमत का शासन, अर्थात नीतियाँ बहुसंख्यक जनता की चाहत के आधार पर

निर्धारित की जाती हैं।

22.4.2 राजनीतिक समानता

इस सिद्धांत के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को बिना जाति, रंग, मत, लिंग या धर्म के भेदभाव के आधार पर जन मामलों का निर्वहन करने में समान अधिकार प्राप्त होता है। लेकिन राजनीतिक विचारकों का मत था कि आर्थिक संदर्भ में ज्यादा असमानता अंततः राजनीतिक असमानता को जन्म दे सकती है। रॉबर्ट डॉल समस्या को इन शब्दों में व्यक्त करते हैं “यदि नागरिक आर्थिक संसाधनों में असमान हैं… तो वे राजनीतिक संसाधनों में भी असमान होंगे; और राजनीतिक समानता को प्राप्त करना असंभव होगा” । आधुनिक समाज में खास बातें सूचना के नियंत्रण में असमान प्रभाव तथा चुनाव प्रचार में आर्थिक सहायता का है। यह असमान प्रभाव पूर्ण लोकतंत्र की प्राप्ति में एक सख्त रोड़ा है।

अरस्तु के अनुसार लोकतंत्र के चलन के लिए एक आदर्श समाज वह था, जिसमें कि एक वृहद मध्यवर्ग हो- बिना एक अभिमानी और धनी तथा एक असंतुष्ट निर्धन वर्ग के

22.4.3 राजनीतिक स्वतंत्रता

इस सिद्धांत के अनुसार, लोकतंत्र में नागरिकों की बुनियादी स्वतंत्रताओं जैसे कि बोलने की, मेलजोल करने की विचरण और विवेक के प्रयोग में सरकार के हस्तक्षेप से रक्षा की जाती है।

यह कहा जाता है कि स्वतंत्रता और लोकतंत्र को अलग नहीं किया जा सकता है। स्वशासन की अवधारणा सिर्फ मतदान के अधिकार, सार्वजनिक दफ्तर चलाने के अधिकार

तक ही सीमित नहीं है, बल्कि अभिव्यक्ति का अधिकार किसी राजनीतिक दल, हित समूह

या सामाजिक आन्दोलन का सदस्य बनने के अधिकार भी इसके अंतर्गत आते हैं। लोकतंत्र के संचालन में, तथापि, यह उभर कर सामने आया है कि स्वतंत्रता इसका एक आवश्यक भाग होने की अपेक्षा इसके द्वारा खतरा महसूस कर सकती है। निम्न लोकतंत्र के विरुध मुख्य आलोचनाएँ हैं :

अ) ‘बहुसंख्यक निरंकुशता’ स्वतंत्रता को चुनौती देती है बहुसंख्यकता निरंकुशता का अर्थ है बहुसंख्यकों द्वारा अल्पसंख्यकों की स्वतंत्रताओं और अधिकारों का दमन । यह माना जाता है कि अनियंत्रित बहुसंख्यक शासन अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिए कोई स्थान नहीं छोड़ता है।

फिर भी, बहुसंख्यकों की निरंकुशता के आतंक को बढ़ा चढ़ाकर पेश किया जा सकता है। राबर्ट डॉल बताते हैं कि इस अवधारणा के पक्ष में कोई प्रमाण नहीं मिलता है कि जातीय और धार्मिक अल्पसंख्यकों के अधिकारों को राजनीतिक निर्णय प्रक्रिया के वैकल्पिक अवस्थाओं के अंतर्गत अधिक सुरक्षा प्राप्त होती है।

ब) लोकतंत्र बुरे निर्णय लेता है कुछ आलोचकों का मत है कि प्रतिनिधि लोकतंत्र, स्वभावतः बहुसंख्यकता का प्रतीक होता है, और इसलिए पूर्ण नहीं होता है। उनका कहना है कि इसकी कोई गारंटी नहीं है कि प्रतिनिधि लोकतंत्र सदैव ही अच्छे निर्णय लेगा है। बहुसंख्यक, अल्पसंख्यक के ही समान अज्ञानी, निर्दय और लापरवाह हो सकता है और अविवेकी या अयोग्य नेताओं द्वारा भ्रमित किया जा सकता है।

22.5 प्रतिनिधि लोकतंत्र व्यावहार में

इस जानकारी के बाद, अब हम प्रतिनिधि लोकतंत्र के वास्तविक कार्यकलाप पर दृष्टिपात करेंगे। कार्यकारी लोकतंत्र की मुख्य विशेषताएं हैं

स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव,

मुक्त और जिम्मेदार सरकार,

नागरिक और राजनीतिक अधिकार,

नीचे दिया गया स्तंभ इन विशेषताओं को अच्छी तरह से प्रकट करता है।

मुक्त

और उत्तरदायी’ सरकार

एक प्रजातांत्रिक समाज

मुक्त और स्वच्छ चुनाव

नागरिक और राजनीतिक अधिकार

एक प्रजातांत्रिक पिरामिड

डेविड बोथम और केविन बॉयल (1995): लोकतंत्र, पृष्ठ 28
राजनीतिक दल: राजनीतिक दल राजनीतिक प्रक्रिया में निर्णायक भूमिका अदा करते हैं। बड़े पैमाने पर राजनीतिक दल प्रजातांत्रिक प्रणाली के कार्यशील चरित्र को उजागर करते हैं। वे प्रणाली की संस्थाओं की क्रियाशीलता की लिए प्रमुख राजनीतिक गति प्रदान करते हैं।

आर. जी. गेट्टेल के अनुसार, एक राजनीतिक दल में कम या ज्यादा संगठित नागरिकों का एक समूह होता है, जो राजनीतिक इकाई के रूप में कार्य करता है। अपने मताधिकार के प्रयोग के आधार पर उनका लक्ष्य सरकार पर नियंत्रण तथा अपनी सामान्य नीतियों को बढ़ावा देना होता है। एक राजनीतिक दल की कुछ अनिवार्य विशेषतायें हैं :

1) राजनीतिक दल संगठित करने वाले लोगों का मौलिक सिद्धांतों पर एक आम सहमति होती है।

2) वे अपने लक्ष्य प्राप्ति के लिए संवैधानिक तरीकों का इस्तेमाल करते हैं। 3) एक राजनीतिक दल का उद्देश्य समूह हित की अपेक्षा राष्ट्रीय हित को बढ़ावा देना होता है।

4) यह सार्वजनिक हित के उद्देश्य से राजनीतिक शक्ति को प्राप्त करता है। राजनीतिक दल लोकतंत्र के आधार स्तंभ का निर्माण करते हैं और निम्नलिखित कार्यों का संपादन करते हैं:

i) दल जनमत का निर्माण करते हैं: राजनीतिक दल, जनता के फायदे के विभिन्न मुद्दे और समस्याऐं, जैसे आवास जीवन स्तर शिक्षा, विदेशी संबंधों, बजट इत्यादि को जोरदार शब्दों में सरकार के समक्ष रखते हैं।

ii) दल चुनाव संचालन में एक भूमिका निभाते हैं विधायिका का चुनाव दल के आधार पर होता है। राजनीतिक दल पार्टी टिकट के लिए उपयुक्त उम्मीदवार का चुनाव करते हैं। मतदान के दिन दल अधिक से अधिक मतदाताओं की भागीदारी को सुनिश्चित करने का प्रयास करते हैं।

iii) राजनीतिक दल सरकार बनाते हैं दल, जो बहुमत प्राप्त करता है, वह सरकार बनाता

है। यदि किसी भी दल को बहुमत प्राप्त नहीं होता है तो दलों का एक मोर्चा, जोकि

संयुक्त मोर्चा के नाम से जाना जाता है, सरकार बनाता है।

(iv) विरोध दल सरकार पर नियंत्रण रखता है: विरोधी दल सरकार के कार्यों नीतियों पर नजर रखता है और उसकी कमियों और असफलताओं को उजागर करता है।

(v) राजनीतिक दल सरकार और लोगों के बीच संपर्क का कार्य करते हैं: पार्टियाँ सरकार की नीतियों के बारे में लोगों को बताती है तथा लोगों की प्रतिक्रिया को संसद तथा सार्वजनिक अधिकारियों तक पहुँचाते हैं।

vi) राजनीतिक दल लोगों को शिक्षा देते हैं राजनीतिक दल लोगों को उनके राजनीतिक अधिकारों और सरकार में उनके हितों के प्रति सजग बनाते हैं। (vii) राजनीतिक दल एकजुट शक्ति का कार्य करते हैं राजनीतिक दल विभिन्न भागों के

देशवासियों, सभी वर्गों के लोगों का समर्थन पाने के लिए कटिबद्ध होते हैं। अतः वे

एकता सूत्र का कार्य करते हैं।

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