0 भारतीय संघीय व्यवस्था – Soft Study Akash Kumar

भारतीय संघीय व्यवस्था

भारतीय संघीय व्यवस्था

संविधान निर्माताओं के सामने मुख्य प्रश्न था कि संविधान का स्वरूप एकात्मक हो या संघात्मक और इस प्रश्न पर माध्यम मार्ग अपनाया गया। भारतीय संविधान का बहिरंग संघात्मक है, पर अन्तरंग एकात्मक संविधान में भारत को राज्यों का संघ” कहा गया है और संविधान में जहाँ कुछ संघवाद के लक्षणों का प्रभुत्व भी जहाँ-तहाँ दिखता है संविधान निर्माताओं की मंशा भारत में संघात्मक व्यवस्था की स्थापना करना थी. लेकिन संविधान में कहीं पर भी संघ शब्द का प्रयोग नहीं किया गया। बल्कि संघ के स्थान पर राज्यों का संघ शब्द का प्रयोग किया गया है। डी. डी. बसु का विचार है कि, “भारत का संविधान न तो पूर्णरूप से एकात्मक संघात्मक, बल्कि दोनों का सम्मिश्रण है।

है और न ही पूर्णरूप से

डॉ० कश्यप लिखते हैं कि प्रश्न जो प्रायः उठाया जाता है, वह है, केन्द्र और राज्यों के बिगड़ते सुभाष हुए सम्बन्ध का तथा संघात्मक व्यवस्था के भविष्य का। यहाँ भी हम एक भारी भ्रान्ति के शिकार हैं और वह यह कि भारतीय संविधान संघात्मक है अथवा फेडरल । क्या हम ऐसी संवैधानिक व्यवस्था के अन्तर्गत केन्द्रीय संसद जब चाहे राज्यों के नाम सीमाएं आकार क्षेत्र आदि बदल सकती हो और मानचित्र में किसी राज्य विशेष को पूर्णयता मिटा सकती हो, जब चाहे राज्यों की प्रतिनिधि सरकार को शासन सीधे अपने हाथ में ले सकती हो।” 1. भारत संघवाद की स्थिति का अध्ययन करना ।

2. भारतीय संघीय व्यवस्था में केन्द्र-राज्य सम्बन्धों का अध्ययन करना।

भारतीय संघ व्यवस्था का स्वरूप एंव प्रकृतिः

भारतीय संघ व्यवस्था संघीय है अथवा नहीं और यदि संघीय तो उसकी प्रकृति तथा स्वरूप कैसा है? यह विवाद 1950 से ही चला आ रहा है। के. सी. व्हीयर को मुख्य रूप से इस विवाद का जन्मदाता माना जा सकता है क्योंकि उनके द्वारा इस सम्बन्ध में संदेह व्यक्त किया गया है कि भारतीय संघ व्यवस्था वस्तुतः संघीय है। इस सन्दर्भ में जो दो तथ्य उभर कर सामने आए हैं, उन्हें मुख्य रूप से दो भागों में विभक्त किया जा सकता है:

1. वैधानिक या संस्थागत विचारधारा 2. व्यावहारिक विचारधारा

वैधानिक संरचना सम्बन्धी दृष्टिकोण के अनुसार यह कहा जा सकता है कि भारतीय संघ संघीय हैं यघपि इसकी संघीयता की मात्रा के विषय में मतभेद होना स्वाभाविक है। के. सी. व्हीयर, एलेक्जेन्ड्रोविच एंव पॉल एच. एपलबी इस दृष्टिकोण के प्रमुख समर्थक विद्वान हैं। के. सी. व्हीयर के अनुसार भारतीय संघ अधिक से अधिक अर्ध संघीय है। उनकी यह मान्यता हमारे संविधान के सैद्धान्तिक व वैधानिक अध्ययन पर आधारित है। वैधानिक दृष्टिकोण की आलोचना अनेक आधारों पर की गई है। प्रथम भारतीय संधिवान द्वारा स्थापित संस्थाओं की औपचारिक विवेचना संविधान की गतिशीलता की उपेक्षा करती है। संविधान एक अस्थिपंजर मात्र है

भारतीय संघीय व्यवस्था स्वरूप

जिसे दलीय राजनीति से जीवन और रक्त प्राप्त होता है। द्वितीय, वैधानिक दृष्टिकोण व्यवस्था के आन्तरिक कार्य की उपेक्षा करने के कारण सत्ताधिकारों के निर्दिष्ट विभाजन के अन्तर्गत होने वाले वास्तविक परिवर्तनों की विवेचना करने में विफल रहता है। राजनीति विज्ञान की तरह ही संघवाद के अध्ययन के क्षेत्र में व्यवहारवादी दृष्टिकोण ने जल्द ही परम्परागत वैधानिक दृष्टिकोण का स्थान ले लिया। व्यवहारवादी संघ का अध्ययन उसके व्यवहारिक पहलू को ध्यान में रखकर करते हैं। इस प्रकार का अध्ययन राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और प्रक्रियात्मक निर्धारकों के प्रकाश में होता है। नार्क्स फ्रेण्डा, मॉरिस जोन्स तथा अशोक चन्दा ने भारतीय संघ व्यवस्था का व्यवहारिक अध्ययन विशेषकर नियोजन के परिप्रेक्ष्य में किया है। इन विद्वानों के अनुसार नियोजन के फलस्वरूप भारत में न केवल संघ व्यवस्था का ही अन्त हो गया है बल्कि संसदीय प्रणाली भी समाप्त प्रायः सी लगती है।

भारतीय संघ व्यवस्था की प्रकृति के सम्बन्ध में उपर्युक्त दृष्टिकोण के मूल्यांकन एवं प्रकृति के स्पष्ट विवेचन के लिए आवश्यक है कि संविधान में उपलब्ध संघ व्यवस्था के लक्षणों का विवेचन किया जाए। भारत में शासन व्यवस्था के स्वरूप पर विचार-विर्मश करते समय संविधान निर्माताओं के समक्ष यह स्पष्ट था कि देश की राजनीतिक विरासत आर्थिक एवं भौगोलिक स्थिति तथा सामाजिक-सांस्कृतिक वैविध्यपूर्ण स्थिति के फलस्वरूप भारतीय संविधान में कहीं पर भी संघ शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है, इसके बावजूद भारत एक ‘संघ-राज्य’ है। भारतीय संविधान में संघ व्यवस्था के प्रमुख लक्षण अधोलिखित हैं

संविधान की व्यापकता :

संघीय व्यवस्था के लक्षणों के अनुरूप भारतीय संविधान को सर्वोच्चता प्रदान की गई है। भारत में केन्द्र तथा राज्यों की उत्पत्ति संविधान के द्वारा ही है तथा इसी के माध्यम से इन्हें शक्तियाँ प्रदान की गई हैं। भारतीय संविधान विश्व का सर्वाधिक व्यापक संविधान हैं। संघीय व्यवस्था को अपनाने के कारण संघ व राज्यों की शक्तियों का विस्तृत वर्णन किया गया हैं। इस प्रकार संविधान के द्वारा संघ के साथ-2 राज्यों की शासन व्यवस्था का भी प्रावधान किया गया है।

शक्तियों का विभाजन : भारतीय संविधान में केन्द्र तथा राज्यों के मध्य शक्ति विभाजन का भी व्यापक प्रावधान किया गया है। राष्ट्रीय महत्व के 100 विषयों को केन्द्रीय सूची में सम्मिलित किया गया है जिन पर केवल संसद को ही विधि निर्माण का अधिकार प्रवत्त है। स्थानीय शासन के 61 विषयों को राज्य सूची के अन्तर्गत रखा गया है, जिन पर केवल राज्य विधानमंडल को ही कानून निर्माण का अधिकार दिया गया है। संविधान में समवर्ती सूची का प्रावधान किया गया है जिसमें 52 विषयों को शामिल किया गया है। इस सूची में उपलब्ध विषयों के सम्बन्ध में केन्द्र और राज्य दोनों ही विधि पर केन्द्र निर्माण में सक्षम हैं, लेकिन दोनों सरकारों में संघर्ष होने की स्थिति में राज्य विधि पर केन्द्र की विधि को प्राथमिकता दी जाएगी।

सर्वोच्च न्यायालय भारतीय संविधान के संरक्षक के रूप में कार्य करने के लिए एक स्वतन्त्र सर्वोच्च न्यायालय

सर्वोच्च न्यायालय भारतीय संविधान के संरक्षक के रूप में कार्य करने के लिए एक स्वतन्त्र सर्वोच्च न्यायालय

की भी व्यवस्था की गई है। संविधान के द्वारा एक सर्वोच्च न्यायालय और राज्यों में उच्च न्यायालयों की भी व्यवस्था की गई हैं, जिन्हें उन कानूनों को अवैधानिक घोषित करने का अधिकार है जो संविधान के विरुद्ध हैं। उच्च सदन का राज्य सदन होना भारतीय संसद का उच्च सदन अर्थात् राज्य सभा राज्यों का सदन है।

यह राज्यों का प्रतिनिधित्व करता है । यद्यपि यह सच है कि यह प्रतिनिधित्व समानता के आधार पर न होकर,

जनसंख्या के आधार पर है।

संशोधन प्रणाली भारतीय संविधान में संशोधन प्रणाली पूर्णतया संघीय प्रक्रिया के अनुरूप है। संशोधन विधेयकों को राष्ट्रपत्ति के समक्ष उनकी अनुमति के लिए प्रस्तुत करने से पूर्व कम-से-कम आधे राज्यों के विधानमण्डलों के संकल्प द्वारा स्वीकृति प्राप्त करना आवश्यक है। यदि आधे राज्यों के विधानमण्डलों की स्वीकृति प्राप्त न हो तो संविधान के अनेक महत्वपूर्ण अंशों में संशोधन नहीं किया जा सकता।

भारतीय संघीय व्यवस्था स्वरूप

व्यवहार में भारतीय संघवाद : भारत की राजनीतिक परिस्थितियों के साथ संघवाद के स्वरूप में भी परिवर्तन आता रहा है। भारत की संघ व्यवस्था को राजनीतिक तत्वों के बदलते परिप्रेक्ष्य में निम्न प्रकार से चित्रित किया जा सकता है:

केन्द्रीकृत संघवाद का युग 1950 से 1967 तक केन्द्रीकृत संघवाद का युग कहा जा सकता है। 1950 से 1964 तक का भारतीय राजनीति युग नेहरू युग कहलाता है। इस युग में केन्द्र तथा राज्यों के सम्बन्ध मधुर बने रहे और उनमें उग्र मतभेद उभरकर सामने नहीं आए। इस कारण व्यवहार में कुछ ऐसे राजनीतिक तथ्य उभरे जिन्होंने भारत में केन्द्रीकरण की प्रवृत्ति को पनपने में मदद दी केन्द्र में नेहरू, पटेल जैसे नेता मौजूद थे। केन्द्र तथा राज्यों में कांग्रेस का एकछत्र शासन था, अतःमतभेदों को दल के संगठन स्तर पर ही हल कर लिया जाता था।

सहयोगी संघवाद का युग चौथे आम चुनाव (1967) के बाद शक्ति का सन्तुलन राज्यों की ओर झुका।

कांग्रेस का एकमात्र शासन समाप्त हुआ। कांग्रेस दल के विभाजन के पश्चात् लोकसभा में शासक दल अल्पमत

में आ गया जिससे केन्द्रीय नेतृत्व को राज्यों की मांग के आगे झुकना पड़ा।

1967 के चुनावों के बाद संघ व राज्यों के पास्परिक संवैधानिक सम्बन्धों के विषय में मतभेद काफी उम्र

रूप में उत्पन्न हुए। अधिकतर राज्यों में गैर-कांग्रेसी दलों की सरकारें बनी केन्द्र और राज्यों के बीच विवादों के उपरान्त भी सहयोग बना रहा और सहयोगी संघवाद के युग का आरम्भ हुआ। सहयोगी संघवाद का प्रमुख लक्षण केन्द्र और राज्यों की सरकारों की एक-दूसरे पर निर्भरता है। एकात्मक संघवाद का युग 1971 के लोकसभा के चुनाव तथा 1972 के राज्य विधान सभाओं के चुनावों तथा 1980 के लोकसभा के चुनावों के बाद दो तथ्य उभरें- पहला भारतीय राजनीति में श्रीमती गांधी और संजय गांधी ही सर्वमान्य नेता है तथा दूसरा कांग्रेस दल ही जनता का नेतृत्व कर सकता है। इससे शक्ति का सन्तुलन

केन्द्र की ओर झुक गया। जिस तरह से संविधान में संशोधन किए गए उससे तो प्रतीत होने लगा कि भारत

एकात्मकता की ओर उन्मुख हो रहा है।

सौदेबाजी वाली संघ व्यस्था छठे आम चुनावों के परिणामों से भारतीय राजनीति में आमूलचूल परिवर्तन आया। केन्द्र में जनता पार्टी की सरकार स्थापित हुई और राज्यों में विविध दलों की सरकारों की स्थापना हुई। उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, उड़ीसा, दिल्ली, राजस्थान हरियाणा व हिमाचल प्रदेश में जनता पार्टी सत्ता में आई। पंजाब में जनता व अकाली दल, बंगाल में जनता सरकार एक दुर्बल सरकार थी क्योंकि यह विभिन्न घटकों से बनी एक गठबन्धन सरकार के समान थी। अतः राज्यों की सरकारों ने सौरेबाजी करने का प्रयत्न किया। तभी से भारत में संघ व्यवस्था का सौदेबाजी वाला प्रतिमान” ही कार्यरत है।

भारतीय संविधान में एकात्मकता के लक्षण :

संविधान निर्माताओं के द्वारा केन्द्रीय सत्ता को सुदृढ़ता प्रदान की गई है, क्योंकि भारतीय संघ आर्थिक व राजनीतिक समस्याओं तथा प्रादेशिकता की संकीर्ण भावनाओं से ग्रसित था। इन समस्याओं के समाधान के लिए केन्द्रीय सरकार के पास पर्याप्त शक्तियों का होना आवश्यक था, इसीलिए एक सशक्त केन्द्र की स्थापना की

गई है। भारतीय संविधान उपलब्ध एकात्मकता के प्रमुख लक्षण निम्नलिखित है

सातवीं अनुसूची में तीन सूचियों का प्रावधान संविधान की सातवीं अनुसूची में वर्णित सूची में संघीय सूची के सर्वाधिक विषयों को सम्मिलित किया गया है, जिसमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण 100 विषय है। इन पर विधि निर्माण की शक्ति एक मात्र केन्द्रीय सरकार में निहित है। समवर्ती सूची में 52 विषयों पर केन्द्र व राज्य दोनों के ही विधनमंडल विधि निर्माण में सक्षम हैं लेकिन दोनों द्वारा निर्मित विधियों में विधानाभास उत्पन्न होने पर केन्द्रीय कानून ही मान्य होते हैं। राज्य सूची में परिगणित विषयों पर राज्यों को कानून बनाने का एकाधिकार प्राप्त नहीं

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