0 बंधुत्व, जाति, तथा वर्ग : आरंभिक समाज – Soft Study Akash Kumar

बंधुत्व, जाति, तथा वर्ग : आरंभिक समाज

महाभारत

  • महाभारत के रचयिता हिन्दू और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार महर्षि वेदव्यास को माना जाता है।
  • इसमें वेदो वेदांगो उपनिषदों खगोलविद्या पर धर्मशात्रों का वर्णन किया हैl
  • महाभारत विश्व का सबसे बड़ा महाकाव्य (Epic Poetry) है।
  • महाभारत भारत का धार्मिक पौराणिक ऐतिहासिक और दार्शनिक एक ग्रंथ है।
  • महाभारत में एक लाख से अधिक शलोक है।इसलिए इसे शतसाहस्त्र संहिताभी कहते हैं।
  • महाभारत की रचना लगभग 1000 वर्षों तक होती रही l
  • महाभारत में दो परिवारों का वर्णन है कौरव और पांडव

1.1 महाभारत का समालोचनात्मक संस्करण

        (Critical Edition of Mahabharata)

  • 1919 में प्रसिद्ध सांस्कृतिक विद्वान वी.एस सुकथांकर के नेतृत्व में एक महत्वपूर्ण परियोजना की शुरुआत की गई जिसके अंदर अनेक विद्वानों ने मिलकर महाभारत का समालोचनात्मक संस्करण तैयार करने का जिम्मा उठाया।
  • समालोचनात्मक :- गहरा अध्ययन
  • शुरुआत में देश के विभिन्न भागों से विभिन्न लिपियों में लिखी गई महाभारत की संस्कृत पांडुलिपियों को एकत्रित किया गया।
  • परियोजना पर काम करने वाले विद्वानों ने सभी पांडुलिपियों में पाए जाने वाले श्लोको की तुलना करने का तरीका ढूंढ निकाला।
  • उन्होंने उन श्लोको का चयन किया जो लगभग सभी पांडुलिपियों में पाए गए थे।
  • उनका प्रकाशन 13000 पृष्ठों  में फैले अनेक ग्रंथ खंडों में किया गया
  • इस परियोजना को पूरा करने में 47 वर्ष लगे। जिसमे दो बातें निकलकर आई।
  • संस्कृत के कई पाठों के अनेक अंशो में समानता थी जैसे उदाहरण : उत्तर में कश्मीर और नेपाल से लेकर दक्षिण में केरल और तमिलनाडु तक सभी पांडुलिपि में समानता पाई गयी।
  • कुछ शताब्दियों के दौरान महाभारत के प्रेषण में कई क्षेत्रीय भिन्नता नज़र आई।
  1. बंधुत्व एवं विवाह :

 परिवारों के बारे में जानकारी

  • परिवाररक्त संबधियों का समूह
  • परिवार समाज का निर्माण करते हैं
  • परिवार बच्चों का अनौपचारिक रूप से सामाजिकरण करता है
  • प्राचीन समय में परिवार के लिए संस्कृत ग्रंथों में कुल शब्द का प्रयोग किया जाता था।
  • परिवार एक बड़े समूह का हिस्सा है, जिसे संबंधी कहते हैं
  • तकनीकी भाषा के अनुसार संबंधियों को जाति समूह कहते हैं।
  • परिवार प्यार और आदर्श का प्रतीक होता है।
  • पारिवारिक रिश्ते नैसर्गिक (Natural) और रक्त संबंधी माने जाते हैं।
  • किन्तु इन संबंधों की परिभाषा अलगअलग तरीके से की जाती है।
  • कुछ समाजो में भाईबहन (चचेरे मौसेरे) आदि से खून का रिश्ता माना जाता है। किंतु अन्य समाज में ऐसा नहीं मानते।
  • आरंभिक समाज के संदर्भ में इतिहासकारों को विशिष्ट परिवारों के बारे में जानकारी आसानी से मिली जाती थी। लेकिन सामान्य लोगों के परिवारिक संबंधों को पुनः निर्मित करना मुश्किल हुआ करता था।

2.2 पितृवंशी व्यवस्था :

  • पितृवंशी व्यवस्था जिसके अंदर पुरुष प्रधान होता है, जो कि एक मुखिया के रूप में एक शक्तिशाली और प्रभावशाली होता है।
  • इस व्यवस्था में पिता के बाद पुत्र को संपत्ति और शक्ति प्रदान कर दी जाती है।
  • महाभारत के संदर्भ में पितृवंशी व्यवस्था :
  • महाभारत में दो परिवारों की कहानी थी जिसके अंदर एक ही वंश से संबंधित कुरुवंश के परिवार शामिल थे कौरव तथा पांडव।
  • इनका एक जनपद पर शासन था यह एक संघर्ष का युद्ध था जिसके अंदर पांडवों की विजय हुई।
  • इसके बाद पितृवंशी उत्तराधिकार को उदघोषित किया गया।
  • पितृवंशी में पुत्र पिता की मृत्यु के बाद उनके संसाधनों पर अधिकार जमा सकते थे।
  • पुत्र के ना होने पर भाई या अन्य बंधु आसानी से अधिकार जमा लेते थे।
  • विशिष्ट परिस्थितियों में स्त्रियों को भी सत्ता प्राप्त थी

2.3 विवाह के तौर तरीके एवं नियम

  • विवाह के प्रकार :
  • अंतर्विवाह : सजातीय विवाह ( एक गोत्र एक कुल में विवाह)
  • बहिर्विवाह : विजातीय विवाह (गोत्र से बहार विवाह)
  • बहु पति विवाह : एक से अधिक पति होना।
  • बहु पत्नी विवाह : एक से अधिक पत्नी होना।

2.4 गोत्र क्या है ?

  • गोत्र एक ब्राह्मण पद्धति जो लगभग 1000 ईसा पूर्व के बाद प्रचलन में आई। इसके तहत लोगों को गोत्र में वर्जित किया जाता था।
  • प्रत्येक गोत्र एक वैदिक ऋषि के नाम पर होता था उस गोत्र के सदस्य ऋषि के वंशज माने जाते थे।

गोत्र के दो नियम महत्वपूर्ण थे :

(i) विवाह के बाद स्त्री को अपने पिता के गोत्र को बदलकर पति का गोत्र लगाना पड़ता था।

(ii) एक गोत्र के सदस्य आपस में विवाह नहीं कर सकते थे। (बहिर्विवाह)

2.4 गोत्र :

  • क्या इन गोत्र के नियमो को सभी माना करते थे ?
  • नहीं, सातवाहन शासकों ने इन गोत्र के नियमों को नहीं माना।
  • कुछ सातवाहन बहु पत्नी विवाह की प्रथा को माना करते थे।
  • सातवाहन शासको की पत्नियाँ अपने पिता के गोत्र को ही अपना गोत्र रखती थी।
  • एक वैकल्पिक प्रथा : अंतर्विवाह
  • अंतर्विवाह: अपने ही गोत्र या अपने ही कुल (परिवार / रिश्तेदारी / नातेदारी) में शादी करना।यह प्रथा दक्षिणी भारत में प्रचलन में थी।

2.5 क्या माताए महत्वपूर्ण थी ?

  • इतिहासकारों के अनुसार सातवाहन राजाओं को उनके मातृ नाम ( माता के नाम) से चिन्हित किया जाता था।
  • इससे यह प्रतीत होता है कि माताएँ महत्वपूर्ण थी।
  • किंतु किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले बहुत सावधानी बरतनी होती है।
  • सातवाहन राजाओं के संदर्भ में इतिहासकारों को ज्ञात हुआ है कि शासन का उत्तराधिकारी पितृवंशिक होता था।
  1. सामाजिक विषमताएँ :

 3.1 उचित जीविका :

 वर्ण व्यवस्था :

  • धर्मशास्त्रों और धर्मसूत्रों के अनुसार वर्ण व्यवस्था एक आदर्श व्यवस्था थी।
  • ब्राह्मण इस व्यवस्था को एक दैवीय व्यवस्था मानते थे। जिनमें उन्हें उच्च स्थान प्राप्त था।
  • जबकि शुद्रो एवं अस्पृश्यों को एक व्यवस्था के अनुसार समाज में निम्न समाज प्राप्त था।
  • इस व्यवस्था में दर्जा जन्म के आधार पर तय होता था।
  • धर्मशास्त्रों और धर्मसूत्रों में चार वर्गों के लिए आदर्श जीविका से जुड़े नियम मिलते हैं।
  • ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य तथा शूद्र
  • ब्राह्मण : अध्ययन करना, वेदो की शिक्षा, यज्ञ करना और करवाना तथा दान देना और लेना।
  • क्षत्रिय : युद्ध करना, लोगों को सुरक्षा प्रदान करना, न्याय करना, वेद पढ़ना, यज्ञ करवाना, और दानदक्षिणा देना  था।
  • वैश्य:  कृषि, गौपालन और व्यापार का कर्म भी अपेक्षित था।
  • शूद्र : इनका कार्य तीनो उच्च श्रेणी के वर्णों की सेवा करना था।
  • नियमो का पालन
  • इन नियम का पालन करवाने के लिए ब्राह्मण ने दो तीन नीतियाँ अपनायी।
  • वर्ण व्यवस्था एक दैवीय व्यवस्था है
  • शासको को उपदेश देते थे की वे इस व्यवस्था के नियमों का अपने राज्यों में पालन करवाए।
  • उन्होंने लोगो को यह विशवास दिलाने का प्रयास किया कि उनकी प्रतिष्ठा जन्म आधारित है।
  • शास्त्रों के अनुसार केवल क्षत्रिय राजा ही हो सकते थे लेकिन अन्य राजाओ की उतपत्ति अन्य वर्णों से भी हुई थी।
  • मौर्य वंश :- चंद्रगुप्त मौर्य (जिसने एक विशाल साम्राज्य पर शासन किया)
  • शुंग और कण्व :- मौर्यों के उत्तराधिकारी थे (ब्राह्मण)
  • गौतमी पुत्त सिरि सातकनि: सातवाहन कुल के प्रसिद्ध शासक (ब्राह्मण)

3.3 जाति और गतिशीलता :

  • ब्राह्मणीय सिधान्तो के अनुसार जहाँ वर्ण जन्म आधारित थे वही जाति भी।
  • जहाँ वर्ण केवल चार थे लेकिन जाति की कोई निश्चित संख्या नहीं थी।
  • जातियों को वर्णों में शामिल कर पाना जटिल कार्य था जैसे
  • उदाहरण : जंगलो में रहने वाले निषाद (इस जाती के लोगों का कार्य : शिकार करना मछली पकड़ना)
  • सुवर्णकार : व्यावसायिक वर्ग था।
  • इन्हे चार वर्णों में वर्गीकरण करना अत्यंत जटिल था। इसी कारण इनका जाति में वर्गीकरण कर दिया गया।
  • वे जाति जो एक ही जीविका अथवा व्यवसाय से जुड़ी होती थी उन्हें श्रेणीयो में भी संगठित कर दिया।
  • जैसे कुछ श्रेणी संगठन:
  • मंदसौर (मध्य प्रदेश) : रेशम के बुनकर का वर्णन मिला जिसमे
  • लाट (गुजरात) : के निवासी थे वह मंदसौर चले गए।
  • उस समय मंदसौर को दशपुर के नाम से जाना जाता था।
  • यह कठिन यात्रा उन्होंने बच्चो और बंधुओ के साथ की।

3.4 चार वर्णों के परे: एकीकरण

  • उपमहाद्वीप में पाए जाने वाली विविधताओं की वजह से यहाँ हमेशा से ऐसे समुदाय रहे जिन पर ब्राह्मणीय विचारों का कोई प्रभाव नहीं पड़ा।
  • संस्कृत साहित्य में ऐसे समुदाय का उल्लेख आता है तो उन्हें विचित्र असभ्य और पशुवत चित्रित किया जाता है।
  • यह लोग शिकार और कंदमूल से अपना जीवन निर्वाह किया करते थे।
  • इनमें निषाद वर्ग जो कि एकलव्य (यह राजा हिरण्य धनु नामक निषाद के पुत्र थे) से जुड़ा माना जाता है।
  • पशुपालकों के समुदाय को भी शंका की दृष्टि से देखा जा सकता है।
  • मलेच्छ यह असंस्कृत थे जिन्हें हीन भावना से देखा जाता था।

3.5  चार वर्णों के परे : अधीनता और संघर्ष :

  • ब्राह्मण कुछ लोगों को वर्ण व्यवस्था वाली सामाजिक प्रणाली के बाहर मानते थे साथ ही उन्होंने समाज के कुछ वर्गों को अस्पर्शय घोषित करा।
  • ब्राह्मणों का मानना था कि कुछ कर्म खासतौर से वे जो अनुष्ठान के संपादन से जुड़े हैं पुनीत और पवित्र थे।
  • अपने को पवित्र मानने वाले लोग अस्पृश्यों से भोजन नहीं स्वीकार करते थे।
  • पवित्रता के इस पहलू को ठीक विपरीत कुछ ऐसे कार्य जिन्हें खासतौर पर दूषित माना जाता था।
  • मृतक शवों के और मृत पशुओं को छूने वालों को चांडाल कहा जाता था। उन्हें वर्ण व्यवस्था वाले समाज में सबसे निम्न कोटि में रखा जाता था
  • वे लोग जो समय को सामाजिक क्रम में सबसे ऊपर मानते थे वे इन चाण्डालों का स्पर्श यहाँ तक कि उन्हें देखना भी आपवित्र मानते थे।
  • मनुस्मृति के अनुसार चाण्डालों के कार्य :
  • चाण्डालो को गाँव से बाहर रहना पड़ता था।
  • फेंक हुए बर्तन का इस्तेमाल करना पड़ता था।
  • मरे लोगों के वस्त्र पहनना पड़ता था।
  • लोहे के आभूषण पहनने पड़ते थे।
  • रात में गावों और नगरों में चल फिर नहीं सकते थे।
  • चीनी यात्री बौद्ध भिक्षु फाशिएन (लगभग पांचवीं शताब्दी ईसवीका कहना था कि अस्पृश्यों को सड़क पर चलते हुए करताल बजाकर अपने होने की सूची देनी पड़ती थी जिससे अन्य जन उन्हें देखने के दोष से बच जाए।
  • एक चीनी तीर्थयात्री शवैतत्सांग (लगभग सातवीं शताब्दी ईसवी) कहते हैं कि वधिक और सफाई करने वालों को नगर से बाहर रहना पड़ता था । 

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